आरज़ू-मेरी महफ़िल से #अखिलेश त्रिपाठी
युही मन में कही सारी बाते हिलकोरे मारते रहती है , कई बार भावनाओ में तो कभी विचारो के सागर में भर्मण कर लेता हूँ। आनंद मिलता है और कभी उस आनंद से कुछ शब्द की मोती निकल पड़ती है. जीता हूँ जीवन को एक उत्सव की तरह.… युही आरजू लिए पल भर की … . #अखिलेश_त्रिपाठी
Sunday, 14 September 2014
Thursday, 11 September 2014
''जिन्दगी और मौत''
जिन्दा थे तो किसी ने पास भी बिठाया नहीं !
अब खुद मेरे चारो और बैठे जा रहे है !!
पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पूछा !
अब सभी आंसू बताये जा रहे है !!
एक रुमाल भी भेट नहीं किया जब हम जिन्दा थे !
अब शाले और से कपडे ऊपर से ओढ्ये जा रहे है !!
सबको पता है , शाले और कपडे इसके काम के नहीं !
फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाए जा रहे है !!
कभी किसी ने एक वक्त का खाना तक नहीं खिलाया !
अब देशी घी मेरे मुह पे मले जा रहे है !!
जिंदगी में एक कदम भी साथ चल ना सका कोई !
अब फूलो से सजाकर कंधो पे उठाये जा रहे !!
आज पता चला की , मौत जिंदगी से कितनी बेहतर है !
हम तो बेवजह ही जिंदगी की चाहत किये जा रहे है !!
…अखिलेश त्रिपाठी
अब खुद मेरे चारो और बैठे जा रहे है !!
पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पूछा !
अब सभी आंसू बताये जा रहे है !!
एक रुमाल भी भेट नहीं किया जब हम जिन्दा थे !
अब शाले और से कपडे ऊपर से ओढ्ये जा रहे है !!
सबको पता है , शाले और कपडे इसके काम के नहीं !
फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाए जा रहे है !!
कभी किसी ने एक वक्त का खाना तक नहीं खिलाया !
अब देशी घी मेरे मुह पे मले जा रहे है !!
जिंदगी में एक कदम भी साथ चल ना सका कोई !
अब फूलो से सजाकर कंधो पे उठाये जा रहे !!
आज पता चला की , मौत जिंदगी से कितनी बेहतर है !
हम तो बेवजह ही जिंदगी की चाहत किये जा रहे है !!
…अखिलेश त्रिपाठी
ख़त में लिपटी रात... 2
सुनो,कुछ ना कहूं क्या
तुमसे ? हर बार मेरी बात क्वेश्चन मार्क से ही क्यूँ
शुरू होती है, तुम इसके लिए मुझसे नाराज़ हो सकती हो.. सवाल कर
सकती हो । पर मेरी एक ही उम्मीद लगी है तुमसे कि तुम्हारा कुछ कहा, मैं सुनूं । अब इतनी भी उम्मीद लगाने की मेरी
हैसियत नहीं, ये ना कह देना । सिर्फ़ इतना तो तुमसे चाह ही सकता
हूँ । और किसी बात की उम्मीद मैंने छोड़ दी है । उस वक़्त से, जब ये एहसास हुआ कि मेरे और तुम्हारे बीच बहुत
डिफरेंस है । सोच की नहीं, क्लास की । लोअर मिडिल क्लास और अपर क्लास की । अगर हम दोनों मिल भी जाते तो पूरी ज़िन्दगी इस खाई को भरने में ही लग जाती शायद ।
मुझे मालूम है इस बात से तुम इत्तेफ़ाक़ नहीं रखोगे, क्यूंकि
तुम्हारी सोच.. तुम्हारे ख़यालात बिलकुल मेरी तरह है। ज़मीं की मिट्टी की तरह । पर
तुम्हारे आसपास बहुत चमक है, जिसके
लिए शायद मैं.. 'परफेक्ट' नहीं
। अब इन सबके बीच अगर मैंने तुमसे कुछ लफ़्ज़ों का नज़राना मांग लिया तो क्या गुनाह
कर दिया ! मैं तुम्हें अपने बेहद क़रीब रखना चाहता हूँ । हाँ, तुमने बताया हुआ है कि तुम बंधे हुए आदमी नहीं
हो.. पर मैं तुम्हें बांध कर भी नहीं रखना चाहता । बस, तुम्हारे
किसी और से बंध जाने का डर है मुझे.. जो मुझे हर बार कमज़ोर बना देता है । मैं नहीं
चाहता तुम्हारे सामने आना, पर तुम्हें एक झलक देखना मेरी ख़ुराक है । मैं
तो बस तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ.. तुम्हारे लफ़्ज़ों को सुनना चाहता हूँ.. जी भर
के । यकीनन इतने भर से तुम्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा.. पर फिर भी एक बार अपनी
ख़ामोशी तोड़कर, मेरे हाथों को अपना लम्स देकर.. कुछ कह जाओ..
कोई तो तोहफ़ा दे जाओ ।मैं
तुम्हारा कुछ भी नहीं.. मुझे एहसास है इस बात का । हर बार ख़त के आख़िर में अपना नाम
लिख कर, मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता ।
-----------
ख़ामोशी में तैरती इक रात..तुम्हारे लफ़्ज़ों के इंतज़ार में रफ़्ता-रफ़्ता गुज़र रही है ।क्यूँ नहीं तोड़ देते तुम अपनी ख़ामोशी को टुकड़ों-टुकड़ों में.. लफ़्ज़ों-लफ़्ज़ों में..क्यूँ नहीं बिखर जाते तुम रेत की तरह सांसों-साँसों में.. हाथों-हाथों में..कब तक यूँ ही संगमरमर बने रहोगे कब तक ख़ामोशी का इम्तिहान लेते रहोगे इसे इत्मीनान नहीं..अब मेरी ख़ामोशी डूब रही हैख़ामोशी में तैरती इक रात..तुम्हारे लफ़्ज़ों के इंतज़ार में रफ़्ता-रफ़्ता गुज़र रही है ।@अखिलेश त्रिपाठी
ख़ामोशी में तैरती इक रात..तुम्हारे लफ़्ज़ों के इंतज़ार में रफ़्ता-रफ़्ता गुज़र रही है ।क्यूँ नहीं तोड़ देते तुम अपनी ख़ामोशी को टुकड़ों-टुकड़ों में.. लफ़्ज़ों-लफ़्ज़ों में..क्यूँ नहीं बिखर जाते तुम रेत की तरह सांसों-साँसों में.. हाथों-हाथों में..कब तक यूँ ही संगमरमर बने रहोगे कब तक ख़ामोशी का इम्तिहान लेते रहोगे इसे इत्मीनान नहीं..अब मेरी ख़ामोशी डूब रही हैख़ामोशी में तैरती इक रात..तुम्हारे लफ़्ज़ों के इंतज़ार में रफ़्ता-रफ़्ता गुज़र रही है ।
"बच्चो के अरमान "
स्टूल पर चढ़ कर बल्ब उतारते हुए, वो गिरा है अभी... जो कभी कहता था, आसमान से तारे तोड़ कर लायेगा ..
आरज़ू-मेरी महफ़िल से #akhilesh_tripathi
आरज़ू-मेरी महफ़िल से #akhilesh_tripathi
Wednesday, 10 September 2014
"ख़त में लिपटी रात..."
हाँ! मैं कब से तुम्हें ऐसे ही पुकारना चाहता था और तुम भी मुझे
ऐसे ही पुकारो, यही चाहता था । ये ख़त इसलिए क्यूंकि ख़त लिखने का मौसम फ़िर से लौट
आया है । सुना है, सबसे ज़्यादा प्रेम लिफ़ाफ़े में बंद इन्हीं लिखे शब्दों में झलकता है
।
मैं क्यूँ नहीं रह सकता तुम्हारे साथ ? मैं क्यूँ दूर जाऊं
तुमसे या तुम मुझसे क्यूँ दूर जाना चाहती हो ? मुझे तो तुम्हारे साथ अपना हर वक़्त
बिताना था.. सब बातें कहनी थी । तुम्हारी कुछ भी ना कहने की आदत सीखनी थी । मुझे
तुम्हारे जैसा होना था ।
मैंने क्या चाहा था तुमसे, ये मुझे ख़ुद नहीं
पता ! बस इतना कि मुझे तुमसे टोकरी भर बातें करनी थी और तुम्हारी कुछ बातें सुननी
थी । तुम्हारे साथ सुबह की चाय,
दोपहर का अलसाना, शाम की फ़ुर्सत, रात का महकना... ये
सब गुज़ार सकूं, बस यही चाहा था । एक और चीज़ चाही थी, जो मुझे बेहद पसंद है.. और वो है
सिर्फ तुम्हारी यादे जो तुम मुझे लाकर दो.. ।
जिस समन्दर के किनारे मैं कब से जाना
चाहता हूँ.. वहाँ मैंने तुम्हारे साथ जाने
का सपना देखा था । वहीँ किनारे किसी बेंच पर तुम्हारे साथ बैठ सकूं,तुम्हारे गाल नोंच
सकूं, तुम्हें कस के गले लगा सकूं, रेत पर तुम्हारे पैरों पर अपने पाँव
रखकर चल सकूं, लड़खड़ा सकूं, और तुम संभाल सको... बस यही चाहा था । पर मेरा ये सपना गीली रेत से
बनाये उस घर जैसा था, जिसे समंदर अपनी लहरों के साथ बहा ले गया ।
ये सच है, मैं जो कुछ लिखता हूँ वो तुम्हें सोचकर लिखता हूँ । जो अनकही है, उन्हें लिखता हूँ । पर एक बात जो तुम्हें नहीं मालूम कि मैं तुम्हारा
लिखा सिर्फ़ अपने लिए पाता हूँ । सिर्फ़
अपने लिए समझता हूँ.. इसमें कोई और रुख़, मुझसे बर्दाश्त
नहीं होता । तुम्हारे लिखे में हर बार मैं अपना नाम ढूंढता हूँ । ख़ुद से जोड़ लेता हूँ। तुम्हारी नज़र में यही मेरी गलतियां हैं..
पर मेरे लिए ये एक ज़रिया है, तुम्हें अपने क़रीब पाने का.. बेहद करीब..बेहद बेहद करीब ।
तुम्हारा लिखा पढ़ते वक़्त कई बार आँखें
भर गयी है में ..कई बार मुस्कुराया हूँ मैं.. जैसे एक-एक शब्द तुम मेरे कानों में
सुना रही हो तुम । आते-जाते.. सड़क पर या
फिर मेट्रो में सफ़र करते हुए,
जब भी तुम्हारा कुछ पढ़ा, मेरी भावनाएं मेरे
बस में ना रही । ये सच है ये ख़्वाबों की दुनिया है.. पर ख़्वाब तुमने नहीं देखे
क्या कभी ?
मुझे मालूम है हम दोनों नहीं मिल सकते
। क्यूँ नहीं मिल सकते, इसकी समझ मुझ में नहीं । ये सब तो मेरा कहा है, मेरे दिल की बात
है.. पर तुम्हारे दिल में क्या है,
ये तुमने कभी बताया ही नहीं.. या
बताना चाहा ही नहीं.. या फिर तुम्हारे दिल में मेरे लिए कुछ रहा ही ना हो ! बस यही
एक तकलीफ़ है । पहले एक बार कहा था ना तुमसे कि जब मिलोगी , और मैं गले लगने
आऊं तो मुझे झटकना मत.. तुमने वही कर दिया है.. झटक दिया मुझे । देखा नहीं, मैं कितना चहकता
हुआ सिर्फ़ तुम्हारे क़दमों की आहट सुन के
दौड़ता –भागता चली आया .. बस मुझे आता देख
तुमने अपना मुंह फेर लिया :’( ।
मैंने कई बार खुद को तुम्हारे पास
पाया है .. नहीं.. नहीं ! तुम्हें अपने पास महसूस किया । ख़ुद को कैसे भेज दूं
तुम्हारे पास?.. उसकी इजाज़त तुमने कहाँ दी है ! पर क्या तुमने मुझे अपने आसपास कभी
महसूस नहीं किया !!! मुझे ये भी कभी समझ नहीं आया कि यूँ ही बैठे-बैठे.. या कोई
दूसरा काम करते हुए मेरे दिल से तुम्हारा नाम कैसे निकल जाता है ! हंसी आएगी
तुम्हें..पर कई बार होंठों से भी अकेले में तुम्हारा नाम पुकार ही देता हूँ । मुझे नहीं मालूम, मेरा दिल इतना
पावरफुल कैसे हो गया ! शरीर के सारे अंगों में सबसे ज़्यादा मज़बूत । और अब तुम्हें
ये छोड़ नहीं पा रहा.. दूर नहीं कर पा रहा.. हर बार एकाधा बातें कहने की फ़िराक़ में
रहता है । तुमसे अलग होना इसके लिए कमज़ोरी की बात है ।
पिछला सावन भी हरा नहीं था.. सादा ही
गुज़रा । इस सावन से फ़िर से ढ़ेर सारी उम्मीद लगाए बैठा हूँ.. शायद बूंदे मेरे लिए
कोई पैग़ाम लेकर आये । जिसे पाकर मैं हँसते हुए रो सकूं या रोते-रोते हंस सकूं !
जैसे अभी कुछ बूंदे डायरी के पन्नों पर आ गिरी है.. ये सावन मेरे लिए इस बार शायद
और हरा हो जाए ! और कुछ नहीं,
तो एक ख़त ही मेरे नाम से भेज देना
जिसे मैं तुम्हारी आवाज़ में पढ़ सकूं ।
ये तोहमतें नहीं है.. ना ही शिकायतें
हैं.. इसे भी मेरे प्यार का एक अंदाज़ ही समझना । तुम जैसे रहना चाहते हो, वैसे ही रहो ।
मुझसे दूर । पर तुम मेरे क़रीब हमेशा रहोगे.. क़रीब नहीं, तुम तो मेरे अन्दर
रहते हो । तुमसे जुदा होना मुश्किल है.. लेकिन तुम्हारे साथ रहना सांस लेने जैसा है
। बेहतर है सांस लेता रहूँ.. धीमे-धीमे
तुम्हें महसूस करता रहूँ । तुम्हारी
ख़ामोशी को पढ़ता रहूँ और समझने की कोशिश करता
रहूँ ।
नहीं नहीं करते-करते देखो मैं कितना
बोल गयी.. आजकल मौसम ही ऐसा है.. सच ज़ुबान पर आ ही जाता है । सुनो, अब ज़्यादा नहीं लिख
सकता । ख़त हैं ना, क्या पता उड़ते-उड़ते किसी के हाथ लग जाए.. कोई और पढ़ ले !
तुम्हारा ,
मुझे तो ये भी नहीं पता मैं तुम्हारा क्या
हूँ !! इतना पता है कि बस तुम्हारा हूँ, चाहे तुम मुझे अपना समझो..ना समझो !
इसलिए इस बार इसे ख़ाली ही रहने देता हूँ ।
हाँ! मैं कब से तुम्हें ऐसे ही पुकारना चाहता था और तुम भी मुझे
ऐसे ही पुकारो, यही चाहता था । ये ख़त इसलिए क्यूंकि ख़त लिखने का मौसम फ़िर से लौट
आया है । सुना है, सबसे ज़्यादा प्रेम लिफ़ाफ़े में बंद इन्हीं लिखे शब्दों में झलकता है
।
"Sapno Ka Ghar"
सीमेंट से सने हाथ पैर लिए, किसी के सपनों का घर बना कर लौट रहा वो मज़दूर.... ज़रा सी जगह ढूंढेगा फूटपाथ पर, और सो जाएगा....
#akhilesh_tripathi
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