Thursday, 11 September 2014

''जिन्दगी और मौत''




जिन्दा थे तो किसी ने पास भी बिठाया नहीं !
अब खुद मेरे चारो और बैठे जा रहे है !!
पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पूछा !
अब सभी  आंसू बताये जा रहे है !!
एक रुमाल भी भेट नहीं किया जब हम जिन्दा थे !
अब शाले और से कपडे  ऊपर से ओढ्ये जा रहे है !!
सबको पता है , शाले और कपडे इसके काम के नहीं !
फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाए जा रहे है !!
कभी किसी ने एक वक्त का खाना तक नहीं खिलाया !
अब  देशी घी मेरे मुह पे मले  जा रहे है !!
जिंदगी में एक कदम भी साथ चल ना सका कोई !
अब फूलो से सजाकर कंधो पे उठाये जा रहे !!
आज पता चला की , मौत  जिंदगी से कितनी बेहतर है !
हम तो बेवजह ही जिंदगी की चाहत किये जा रहे है !!

…अखिलेश त्रिपाठी 

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